कहानी- अंशुल (Short Story- Anshul)

“आप… आईं नहीं तो मुझे लगा… कहीं आंधी-तूफ़ान की वजह से, रास्ते में तो फंस नहीं गईं. सारा रास्ता मैं आपको ढूंढ़ते हुए आया!…” अंशुल परेशान हो उठा था.
“अंशुल… तुम क्यों आए? ऐसे आंधी-तूफ़ान में मैं कैसे बाहर निकल पाती? और तुम भी… देखो, अंशुल इस तरह मेरी फ़िक्र ना किया करो…!” मैं झुंझला उठी थी. मेरे पास अंशुल को पहनाने लायक कोई दूसरा कपड़ा भी नहीं था.
“आप भी तो… मेरी फ़िक्र करती हैं ना! फिर मैं कैसे आपकी फ़िक्र ना करूं?” गीली आंखों को मुझ पर केंद्रित कर अंशुल ने कहा तो मेरे अंदर कुछ डगमगाने लगा था.

पौष मेला! विश्‍व भारती, शांतिनिकेतन का खुला प्रांगण और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का खुला मंचन! मैं भी ऐसे ही एक खुले मंच पर अपने संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही थी.
कड़कड़ाती ठंड के बावजूद दर्शकों, श्रोताओं और सैलानियों से शांतिनिकेतन का पूरा कैम्पस भरा पड़ा था.
अपने तांत के साड़ी के पल्लू से ठंड का सामना करने में असमर्थ होने पर मैंने गर्म शॉल में ख़ुद को समेटा और मंच पर दूसरे ‘रवींद्र-संगीत’ के लिए तैयार हो रही थी. देशी-विदेशी सैलानियों के कैमरों का फ़्लैश बीच-बीच में ध्यान आकर्षित करता था.
“पुरानो सेई… दिनेर को था, भूलबि कि रे हाय…! सेई चोखेर देखा, प्राणेर सखा… से कि भोला जाए…”
मैं विभोर होकर अपना प्रिय रवींद्र-संगीत गा रही थी कि दृष्टि दर्शकों के चेहरों पर से तैरते हुए एक जाने-पहचाने किशोर के चेहरे पर ठहर गई.
कैमरे की नज़र से मुझे देख रहे किशोर ने अपनी आंखों के सामने से कैमरा हटाया और धीरे से मुस्कुराते हुए हाथ हिलाया. मैं मुस्कुराते हुए अपने गायन में तल्लीन रही.कुछ देर बाद वो किशोर मेरे साथ था. मेरे ही डिपार्टमेंट की हेड का सत्रह-अठारह वर्षीय बेटा अंशुल!
“बहुत आश्‍चर्य हो रहा है तुम्हें यहां देखकर. इतनी ठंड भरी रात में, तुम्हारी मां ने यहां आने दिया? फिर… तुम तो साइंस के छात्र हो ना? तुम्हारी रुचि… संगीत में कैसे…?” कई सारे सवाल मैंने अंशुल के सामने रखे थे.
मैं चाय पीते हुए उसके चेहरे को ताक रही थी और वो लापरवाह-सा अपने कैमरे में आस-पास की गतिविधियों को कैद कर रहा था.
“आप भी तो… इतनी ठंड में यहां हैं! फिर मां को जब बताया कि आपका कार्यक्रम देखने आ रहा हूं तो… मां ने अनुमति दे दी.” अंशुल ने एक बार चोर नज़र से मेरी ओर देखकर कहा. मैं मुस्कुरा कर रह गई थी. आधी रात के बाद, अपना कार्यक्रम ख़त्म होते ही मैं यूनिवर्सिटी कैम्पस के अपने प्रोफेसर्स क्वार्टर में लौट आई थी. हालांकि अंशुल अभी मेला घूमना चाहता था, पर जब मैंने उसे कहा कि मैं थक गई हूं, तो वो थोड़ा निराश हो गया था. जबरन मैंने उसे घर भेज दिया था. जाने से पहले वो बोलता गया कि दूसरे दिन वो फिर आएगा और मेरे साथ मेला भी घूमेगा.
“अच्छा बाबा… अब घर जाओ.” कहने को तो मैं उससे कह गई थी, पर उसके व्यवहार से मैं थोड़ा सोच में भी पड़ गई थी.
मेले से लौटते समय मेरी रूममेट अरुणिमा भी साथ हो ली थी. जब उसे मैंने अंशुल के आने के बारे में बताया तो होंठों के किनारों से शरारतभरी मुस्कान फेंकते हुए उसने कहा था, “हो ना हो… स्वाति, अंशुल तुम्हारे प्यार में पड़ गया है!”

यह भी पढ़ें: ये दिल दीवाना है… (Science Of Love) “पागल हो क्या…? अंशुल और मेरी उम्र के बीच का फ़ासला देखा है तुमने? अरे… मैं पच्चीस साल की लेक्चरर हूं और वो… अभी बस बारहवीं में पढ़ रहा है.”
“पर हो तो आकर्षक ना…! तुम्हारी बोली, स्वभाव और सबसे बढ़कर तुम्हारा सौंदर्य- स्वाति ये तुम्हें भीड़ में भी अलग कर देते हैं!” अरुणिमा मुझे सातवें आसमान पर चढ़ा रही थी.
“और इसलिए अंशुल मुझे प्यार करने लगा है.. क्यों…? और दूसरे लड़के भी तो हैं ना!” मैं खिसिया उठी थी.
“मैं सच कह रही हूं स्वाति! मैं साइकोलॉजी पढ़ती हूं, पढ़ाती हूं. तुम्हें कैसे बताऊं- अंशुल की उम्र में ऐसा अक्सर हो जाता है. एक आकर्षण… एक मोह… एक भ्रम में किशोर भटकने लगते हैं. इस समय उम्र या स्टेटस को बच्चे भूल जाते हैं. बस एक ख़्वाब, एक नशा किशोरों पर हावी रहता है. तुम देखना स्वाति, मेरी बात सच होती है या नहीं!” अरुणिमा की बातें सुनकर मैं धम्म् से बिस्तर पर बैठ गई थी. सिर चकराने लगा था. दिल बैठने लगा था.
अरुणिमा तो कुछ ही देर में सो चुकी थी.  लेकिन मैं… अंशुल और मेरे परिचय की पुरानी गलियों में चली गई थी.
शायद… सालभर पहले की ही बात होगी. हमारे ‘रवींद्र-संगीत’ शाखा की हेड मिसेज़ अंतरा मुखर्जी के घर विजयादशमी के निमंत्रण पर हम गए थे. वहीं मिसेज़ मुखर्जी ने अपने बेटे अंशुल से हमारा परिचय कराया था. सभी खाने-पीने और गप्पे मारने में व्यस्त थे, तो मैं मिसेज़ मुखर्जी के ख़ूबसूरत बगीचे को देखने के बहाने बाहर निकल पड़ी थी.
तरह-तरह के मौसमी फूलों के अलावा, पचासों क़िस्म के क्रॉटन्स और साथ ही कई तरह के फलों के पेड़-पौधों से भरा बगीचा किसी का भी ध्यान खींच सकता था. मैं धीमे कदमों से हर पौधे और पेड़ को देखते-समझते हुए बगीचे के सौंदर्य को घूंट-घूंट पी रही थी कि बगीचे का माली सामने आ गया.
“दीदी… लगता है आपको पेड़-पौधों का शौक है..?”
“हूं…! हां… काका..! फिर बगीचा बनाया भी तो गया है बेहद मन लगाकर…” मैं गुलमोहर के पेड़ में नीचे लगे गुलदाऊदी के पौधों को देखते हुए बोली थी.
“हां… ये सब… अंशुल बाबा के दिमाग़ का कमाल है. उसे ही तरह-तरह के पौधों को इकट्ठा करने का शौक था.”
पीछे से मिसेज़ मुखर्जी ने आकर कहा तो मैं थोड़ा चौंक पड़ी थी.
“शौक था… मतलब अब नहीं है क्या?” पीछे पलटकर मिसेज़ मुखर्जी के चेहरे को टटोला था मैंने. पहली बार मैंने उन्हें कुछ उदास, अनमना-सा देखा था. जैसे कोई राज़ उन्होंने ज़बरन दबाया हुआ है.
“नहीं… दरअसल… अब क्या करोगी सुनकर? बेकार में तुम्हारा मन दुखी होगा!”

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मैंने उन्हें टोका था, “मैम… आप अपने बेटे के बारे में कुछ बताइए ना!” कुछ देर को हमारे बीच चुप्पी छा गई थी. फिर मुझे लगा कि इस तरह मुझे उनके घरेलू मामलों में, संबंधों के बारे में शायद नहीं पूछना चाहिए था, इसलिए मैंने फिर लज्जित होकर कहा, “मैम… प्लीज़ बुरा मत मानिएगा! दरअसल, आपका बेटा अंशुल कुछ गुमसुम-सा, आई मीन अकेला-सा लगा था. इसलिए…”
“स्वाति… तुमने ठीक पकड़ा! आश्‍चर्य है कि दो मिनट में ही तुमने उसे कैसे समझ लिया..?”
“मैम, वो बेहद प्यारा लड़का है. शायद उसने पिछले साल ही स्कूल फाइनल पास किया था ना..? और मार्क्स भी काफ़ी अच्छे थे ना..?” मैं कुछ याद करते हुए बोली थी.
“हां स्वाति! तुम ठीक कह रही हो! मेरा बेटा अंशुल बेहद अच्छा लड़का है! आज्ञाकारी है. पर बेहद  संवेदनशील है वो! बचपन से ही उसे मेरी तरह संगीत का और अपने पापा की तरह बागवानी का शौक भी रहा है. वो फ़ोटोग्राफ़ी भी कर लेता है. अपने पापा के साथ उसने जगह-जगह से पौधे इकट्ठे कर इस बगीचे को संवारा है, पर… पिछले साल उसके पापा की मौत और कुछ दिनों पहले कैंसर से उसके प्रिय दोस्त की मौत से उसे गहरा सदमा लगा है. वो बिल्कुल टूट गया है. भीतर से किसी भी चीज़ में रुचि नहीं ले पा रहा है. कहता है- एक दिन तो सब ख़त्म हो जाएगा… फिर क्या फ़ायदा…? यहां तक कि ख़ुद को भी भुला बैठा है. पहले तो वह हमेशा बन-ठनकर, उछल-कूद करता, ख़ुश रहा करता था, ज़िंदगी के प्रति गहन आस्था थी उसे, ज़िंदगी में कुछ करना चाहता था वह, अपनी अलग-सी पहचान बनाना चाहता था, लेकिन आज वह… बेटा मेरा…
ज़िंदगी को जैसे घसीट रहा है. नाम मात्र को पढ़ाई करता है, ताकि मुझे दिलासा मिलती रहे. पर मैंने अक्सर उसे अकेले में शून्य को ताकते हुए, गहन सोच में डूबे देखा है. मां हूं मैं उसकी… बोलो कैसे बर्दाश्त कर सकती हूं यह सब! रोती हूं, समझाती हूं पर…”
मिसेज़ मुखर्जी की आंखें नम और स्वर भारी हो उठा था. मैंने उनके हाथों को थाम लिया था. कांप रही थीं वो! मुझे अपराधबोध होने लगा था.
“माफ़ कीजिएगा मैम…! मुझे आपके दुखों को छेड़ना नहीं चाहिए था. पर विश्‍वास कीजिए, मैं इसका हल ढूंढ़ने की कोशिश ज़रूर करूंगी. आपने किसी मनोचिकित्सक से बात की..? काउंसलिंग वगैरह..?”
“हां स्वाति, वो भी साथ चल रहा है. पर डॉक्टर्स कहते हैं कि उसे प्यार की, कंपनी की ज़्यादा ज़रूरत है. अब मैं उसके दोस्तों को भी घर पर बुलाती हूं, पर मेरा बेटा उनसे घुलमिल नहीं पाता है. उसके दोस्त अपने में खो जाते हैं और उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि अंशुल कब धीरे-से उनसे अलग टेरेस पर अकेला बैठा आसमान की ओर देख रहा है… तुम ही बताओ स्वाति, मैं कितनी कंपनी दूं उसे..?”
“मैडम, मैं आपके साथ हूं… मैं देखती हूं, आपके लिए क्या कर सकती हूं!”
और उस दिन से ही अंशुल की समस्या में मैं डूबने-उतराने लगी थी. अंशुल के डॉक्टर्स और काउंसलर से मिलकर उसकी समस्या को समझने के बाद लगा कि मैं कॉलेज के बाद अगर कुछ समय उसके साथ रहूं, तो शायद कुछ कर पाऊंगी.
धीरे-धीरे मैं ज़बरदस्ती अंशुल को तरह-तरह की बातों में खींचने लगी थी. उसे अपने साथ बाज़ार, मेला और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ले जाने लगी थी.
अब उसे जीवन का अर्थ, आकर्षण फिर से समझ में आने लगा था. तब एक द़िक़्क़त हो गई कि वो मुझे कुछ ज़्यादा ही अपने साथ रखना चाहता. अक्सर रात का खाना साथ खाने की ज़िद करता तो मैं उसके साथ डिनर कर लेती. फिर वो अपने घर ही मुझे रात को ठहर जाने को कहता.
“इतना बड़ा घर है हमारा… क्या आपको रात के लिए एक कमरा भी नहीं मिल सकता! फिर मम्मी भी तो चाहती हैं.” अपनी मां के सामने वो मुझे कहता. मिसेज़ मुखर्जी मुस्कुराते हुए अपने बेटे के बदलाव को देखतीं. पर मैं सकपका जाती.
‘अंशुल… क्यों मुझे किसी संबोधन से नहीं पुकारता? मैम… मैडम… नहीं बोल सकता तो दीदी या आंटी भी तो कह सकता है!’ मेरा मन इस बात को लेकर परेशान था. पर चाहकर भी मैं उसकी मां से इसका ज़िक्र नहीं कर पा रही थी.
हालांकि अपनी दोस्त और रूममेट अरुणिमा से ये बातें बताती और वो हंसकर  कहती, “डियर… अब धीरे-धीरे अंशुल से अपना पीछा छुड़ाने की भी कोशिश
करो, नहीं तो लेने के देने पड़ जाएंगे. वैसे भी अब वो नॉर्मल हो चला है. तुम उसे किनारे करो!”
मैं चुप होकर उसकी बातों के अर्थ समझने का प्रयास करती. ऐसा ही एक शाम मैंने किया था.
मौसम के बिगड़े रुख को देखकर मैंने कॉलेज से लौटकर मिसेज़ मुखर्जी के घर ना जाने का मन बनाया था. फोन पर बताना चाहा, पर फोन डेड पड़ा था. मैं यूं ही कमरे में लेट गई थी. बाहर तेज़ ऱफ़्तार से ‘कालबैसाखी’ का आंधी-तूफ़ान कोहराम मचा रहा था. तेज़ हवा, बिजली का चमकना और बारिश! ऐसे में मैं भला कैसे बाहर जा पाती.
पर उस आंधी-तूफ़ान ने अंशुल को आने का रास्ता दे दिया था. अचानक अंशुल को सामने देख मैं डर गई थी. सिर से पांव तक गीला, बिखरे बाल, भयभीत आंखें. मैं उससे कुछ पूछती, उसके पहले अंशुल ने ही मुझसे पूछा था, “आप, ठीक तो हैं ना…?”

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“हां…! मैं तो ठीक ही हूं.” अपना तौलिया उसे बढ़ाते हुए मैं बोली थी.
“आप… आईं नहीं तो मुझे लगा… कहीं आंधी-तूफ़ान की वजह से, रास्ते में तो फंस नहीं गईं. सारा रास्ता मैं आपको ढूंढ़ते हुए आया…!” अंशुल परेशान हो उठा था.
“अंशुल… तुम क्यों आए? ऐसे आंधी-तूफ़ान में मैं कैसे बाहर निकल पाती? और तुम भी… देखो, अंशुल इस तरह मेरी फ़िक्र ना किया करो…!” मैं झुंझला उठी थी. मेरे पास अंशुल को पहनाने लायक कोई दूसरा कपड़ा भी नहीं था.
“आप भी तो… मेरी फ़िक्र करती हैं ना! फिर मैं कैसे आपकी फ़िक्र ना करूं?” गीली आंखों को मुझ पर केंद्रित कर अंशुल ने कहा तो मेरे अंदर कुछ डगमगाने लगा था.
कुछ ही देर में अरुणिमा आई. उसके पास कुछ शर्ट्स थे. अंशुल को उन्हीं में से एक दे दी थी. किसी तरह उसे हमने घर भेजा, लेकिन उस शाम ने मुझे फिर से कुछ सोचने पर विवश कर दिया था. अरुणिमा ने मुझे सलाह दी थी कि अंशुल के साथ अपना व्यवहार मैं सामान्य ही रखूं. इस घटना को ज़्यादा तवज्जो ना दूं और मैंने वही किया था.
दिन, महीने गुज़रते गए,पर अंशुल का अधिकार और स्नेह मैं निरंतर महसूस कर रही थी. इसकी वजह भी मैं जानती थी. उसे उसके क्लासमेट्स वगैरह असामान्य समझते थे, पर मैं नहीं. अब रात की बात ने फिर मेरी नींद उड़ा दी थी. देर रात गए नींद आई और सुबह काफ़ी देर से अरुणिमा की आवाज़ से नींद खुली थी.
“काफ़ी देर हो गई ना? अरे, दस बजे से मुझे क्लास लेने हैं…!” मैं हड़बड़ाकर उठी थी.
“अगर रात देर से सोओगी, तो सुबह देर से ही नींद खुलेगी ना?”
अरुणिमा ने मेरी आंखों में झांककर मेरे रहस्य को पढ़ लिया था, पर मैं चुप रही थी. चाय पीते हुए अरुणिमा ने आगे ख़ुद ही कहा था, “स्वाति, अंशुल एक ऐसी स्टेज से गुज़र रहा है जब उसे दोस्तों की, विशेषकर गर्लफ्रेंड की ज़रूरत… मतलब दोस्ती की ज़रूरत है और तुम्हारी वजह से वो उन्हें अनदेखा कर तुम्हारे आसपास मंडरा रहा है.”
“मेरी वजह से? मतलब…? अरुणिमा, क्या मैं अंशुल पर कोई ज़बरदस्ती कर रही हूं? क्या मैं उसे अपने से बांध रही हूं?” मैं सुबह-सुबह अरुणिमा की बात सुनकर नाराज़ हो उठी थी.
अरुणिमा ने मेरा हाथ पकड़कर अपने क़रीब बैठाया था. फिर उसने कहा, “अब अगर तुम उसका भला करना चाहती हो, तो उसे किसी हॉबी कोर्स में भर्ती करवा दो! फिर तुम जिन्हें जानती हो, ऐसे समझदार युवाओं से उसकी दोस्ती करा दो! अपनी तरफ़ से उसके दोस्तों से कहो कि वो अशुंल की बात को सुनें, ना कि पागल, असामान्य समझकर उसके साथ बुरा व्यवहार करें, उसे अनदेखा-अनसुना करें… स्वाति, तुम समझ रही हो ना, मैं क्या कहना चाह रही हूं. मैं जानती हूं, तुम्हारे छात्र तुम्हारा कहना मानेंगे. अगर तुम वाकई अंशुल को सामान्य बनाना चाहती हो, तो… यही एक उपाय है. और हां… तुम्हें भी धीरे-धीरे ख़ुद को उससे अलग करना होगा. काफ़ी दिनों से तुम अपने घर भी तो नहीं गईं. धीरे-से अंशुल को उसके दोस्तों की कंपनी में छोड़ तुम… कुछ दिनों के लिए आसनसोल चली जाना. स्वाति, अगर लौटने पर तुम्हें अंशुल में बदलाव नज़र नहीं आए तो तुम मुझे कहना!”
अरुणिमा ने पूरे विश्‍वास से मुझे समझाया. मैं सब समझ गई थी.
अंशुल को फोटोग्राफी का शौक था. मैंने उसे एक कोर्स ज्वॉइन करवा दिया. अपने कुछ परिचित, समझदार और होनहार युवाओं से अंशुल का परिचय भी करवा दिया. फिर धीरे से मैं अपने घर चली गई.
पूरे पंद्रह दिनों बाद जब शांतिनिकेतन लौटी, तो वाक़ई सुखद आश्‍चर्य मेरे सामने था. अरुणिमा ने बताया था कि पहले दो-चार दिन अंशुल मुझे ढूंढ़ते हुए परेशान-सा आया था. पर अरुणिमा के इशारे पर उसके नए दोस्त उसे बहलाने लगे थे. छात्रों का एक दल ‘सुंदरवन’ जा रहा था. अरुणिमा ने अंशुल को फोटोग्राफी के बहाने वहां भेज दिया था.
उस लड़के को मैं अपनी आंखों से देख रही थी, जो अपनी क्लास अटेंड करने जा रहा था. उसके पूरे व्यक्तित्व में एक अद्भुत परिवर्तन नज़र आ रहा था. मैंने उसे दूर से देखा, जो अपने दोस्तों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ था.
मुझे देख उसने अपने हाथ लहराए, तो मैं भी प्रत्युत्तर में हाथ हिलाकर अपने क्लास लेने बढ़ गई.

–  सीमा मिश्रा

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