पिता जीवन की पुण्यतिथि पर किरण कुमार ने उनसे जुड़े किस्से बताए, बोले- नारद बनते वक्त वे नॉनवेज छोड़ देते थे

फिल्मों में नारद मुनि की भूमिका निभाने वाले प्रसिद्ध अभिनेता जीवन की आज (10 जून को) 33वीं पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उनके बेटे किरण कुमार ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में पिता को याद किया और उनसे जुड़े कुछ किस्से बताए।

जीवन का असली नाम ओंकार नाथ धर था और वे कश्मीर पंडितथे। 24 अक्टूबर 1915 को पैदा हुए जीवन का निधन 10 जून 1987 को हुआ था। उनका कहना था कि अगर वे एक्टर ना होते तो फोटोग्राफर का काम कर रहे होते।

'पिताजी ने बनाया था वर्ल्ड रिकॉर्ड'

किरण कुमार के मुताबिक, 'मेरे पिताजी के नाम पर एक किरदार को सबसे ज्यादा बार फिल्मों में निभाने का रिकॉर्ड दर्ज है। उन्होंने 61 फिल्मों में नारद मुनि का किरदार निभाया था। यह उपलब्धि उनके नाम से लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है। हालात ऐसे हैं कि अगर कोई नारद मुनि की कल्पना भी करता है तो उसे मेरे पिताजी का चेहरा ही नजर आता है। पिताजी कहते थे कि 'मैंने इतनी बार नारायण-नारायण का जाप किया है कि अगर जिंदगी में भूल-चूक से कुछ भी पाप किए होंगे तो वह धूल चुके होंगे।'

'नारद का किरदार निभाने के दौरान छोड़ देते थे नॉनवेज'

आगे उन्होंने कहा, 'जब भी नारद मुनि की शूटिंग होती थी, तब मेरे पिताजी प्योर वेजिटेरियन हो जाया करते थे। फिर तो वे ना मांस-मच्छी खाते थे और ना ही शराब पीते थे। मैं जब पूछता था कि ऐसा क्यों करते हो? तो वे कहते थे कि ये मेरी तैयारी है। सेट पर खड़ा होकर जब मैं नारायण-नारायण बोलता हूं, तब मेरे अंदर मांस-मच्छी या कुछ भी मांसाहार नहीं होना चाहिए। मैं इस किरदार को बड़ी श्रद्धा के साथ निभाता हूं।'

'पिताजी के साथ शूटिंग देखने जाता था'

किरण कुमार ने बताया, 'आर.के. स्टूडियो के पास वसंत पिक्स स्टूडियो हुआ करता था, जहां पर धार्मिक फिल्मों की शूटिंग हुआ करती थी। उस समय बाबूभाई बड़े चर्चित प्रोड्यूसर-डायरेक्टर हुआ करते थे, जो माइथोलॉजी फिल्मों के किंग थे। बचपन में पिताजी के साथ शूटिंग देखने उनके सेट पर जाया करता था। एक तरफ आसमान में हनुमान जी उड़कर आ रहे हैं, तो दूसरी तरफ से राक्षस आ रहे हैं। देवतागण और राक्षस के बीच वार्तालाप और लड़ाई देखना-सुनना मुझे बहुत अच्छा लगता था। इस तरह की शूटिंग जब भी होती थी, तब मैं पिताजी के साथ देखने जाता था।'

'पिताजी पूरी तरह पारिवारिक व्यक्तिथे'

आगे उन्होंने कहा, 'जब वे घर पर होते थे तो पिता के रूप में होते थे। रविवार को हमारे साथ क्रिकेट खेलते और साइक्लिंग करने जाते थे। महालक्ष्मी मंदिर, सिद्धिविनायक मंदिर और हाजी अली दरगाह पर जाते थे। पिताजी बहुत पूजा-पाठ करते थे। उन्होंने घर-गृहस्थी माताजी पर छोड़ दी थी। घर-गृहस्थी चलाने में वे कभी दखल नहीं देते थे। वे कंप्लीट फैमिली मैन थे। एक बेहतरीन पिता होने के साथ ही अच्छे दोस्त भी थे। रिश्तों को खूबसूरती से निभाते थे। पिताजी की यह सारी शिद्दत थोड़ी बहुत मुझमें भी आई है।'

'पिताजी की इमेज का मुझ पर असर पड़ा है'

'मेरे सबसे अच्छे दोस्त पिताजी ही थे। हमारा रिश्ता बाप-बेटे से ज्यादा दोस्तों का था। उनका ही असर रहा की कभी लल्लो-चप्पो नहीं किया। वे बड़े मंजे हुए एक्टर थे। एक तरफ नारद तो दूसरी तरफ मुनीम, कभी हीरो-हीरोइन के पिता तो कभी विलेन बन जाते थे या कभी कभार कॉमेडी कर लेते थे। उन्होंने हर रोल के साथ एक्सपेरिमेंट किया और उसे बखूबी निभाया है। वे एकदम कंप्लीट एक्टर थे।

'उस वक्त सबकी अपनी स्टाइल होती थी'

'उस जमाने में कन्हैयालाल अंकल, अजीत अंकल, प्राण साहब, दिलीप साहब, देव साहब सभी एक्टर्स का अपना एक स्टाइल होता था। आज नेचुरल एक्टिंग की बात करते हैं, लेकिन उस जमाने में ओवर द क्राफ्ट एक्टिंग करनी पड़ती थी। फिर ऑडियंस आपको आईडेंटिफाई करती थी। पिताजी की जिस तरह से इमेज थी, उसका मेरे जीवन पर बहुत बड़ा असर पड़ा है। मैंने उस समय सेट से लेकर पर्दे पर देखा कि एक्टर में अपने काम के प्रति कितनी श्रद्धा और पैशन है। वे अपने काम को कितनी खूबसूरती और ईमानदारी से निभाते हैं। पिताजी का एक्सप्रेशन मेरी लाइफ स्टाइल पर पड़ा।'

'उस जमाने के एक्टर्स सिर्फ एक्टिंग करते थे'

किरण ने कहा, 'आजकल हम एक्टर अपनी अपनी जिंदगी जीते हैं। शूटिंग करते हैं उसके बाद अपने-अपने घर जाते हैं। सब अपने सुख-दुख में लॉक हैं। यह ठीक है। आजकल एक्टिंग नहीं बिजनेस हो गया है। सबने अपना-अपना प्रोडक्शन खोल लिया है। उस जमाने में एक्टर होते थे तो वे सिर्फ एक्टिंग ही करते थे और कुछ नहीं करते थे। एक्टर्स के बीच तो कमाल की यारी-दोस्ती होती थी।'

'उन दिनों गजब की दोस्ती निभाते थे'

'मुझे याद है संडे को म्यूजिक डायरेक्टर नौशाद साहब के घर जाकर सभी बैडमिंटन खेला करते थे। वहां पर दिलीप अंकल, जॉनी अंकल, अजीत साहब आदि आते थे। सब वहीं पर बैठकर चाय-पानी-नाश्ता करते और वहीं बैठे-बैठे प्लान कर लेते थे कि आज हम किसके घर पर शाम को मिलेंगे। क्या-क्या खाने में पकेगा। उन दिनों गजब की दोस्ती निभाते थे और एक-दूसरे की चिंता करते थे। वे सब एक-दूसरे के न सिर्फ काम की, बल्कि जिंदगी की भी परवाह करते थे। एक अलग ही दौर था। वो दौर दिल का दौर था। आज तो दिमाग और कमर्शियल दौर है।'



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फिल्मों में कई तरह के किरदार निभाने वाले जीवन को सबसे ज्यादा लोकप्रियता 'नारद मुनि' के किरदार से मिली। उन्होंने 61 फिल्मों में इसे निभाया था।


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