फिल्मों में देरी से आए बासु चटर्जी ने असिस्टेंट के तौर पर की थी शुरुआत, लोन लेकर बनाई थी पहली फिल्म

90 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए बासु चटर्जी यानी बासु दा को रोमांटिक फिल्मों का भगवान कहा जाता था। कोलकाता की छाप से निकलकर अपनी अलग शैली बनाने वाले वे पहले फिल्ममेकर थे। लेकिन बासु दा ने इसके लिए कोई फिल्म कोर्स नहीं किया था। क्योंकि उस वक्त ऐसे कोई स्कूल थे ही नहीं। इतना ही नहीं, फिल्मों में उनकी एंट्री भी काफी देरी से हुई थी।

असिस्टेंट के तौर पर की थी शुरुआत
एक इंटरव्यू में बासु दा ने कहा था, "मैं फिल्मों में देरी से आया। उस वक्त मैं 30 की उम्र पार कर चुका था।" बासु के मुताबिक, उन्होंने शुरुआत फिल्ममेकर बासु भट्टाचार्य के चीफ असिस्टेंट के तौर पर की थी और उनकी पहली फिल्म राज कपूर और वहीदा रहमान स्टारर 'तीसरी कसम' में उन्हें असिस्ट किया।

चटर्जी ने बताया था, "मैंने दो फिल्मों में असिस्टेंट के तौर पर काम किया। लेकिन मेरा लक्ष्य कुछ और था। चूंकि, मैं उस समय कार्टूनिस्ट के तौर पर काम कर रहा था, इसलिए मेरे साथ रोजी-रोटी की दिक्कत नहीं थी। असिस्टेंट सिर्फ इसलिए बना, ताकि फिल्म बनाने के लिए जरूरी ज्ञान मिल सके।"

पैरलल हिंदी सिनेमा की शुरुआत में अहम योगदान
चटर्जी ने पहली फिल्म 'सारा आकाश' बनाई थी। 'सारा आकाश', मणि कौल की 'उसकी रोटी' और मृणाल सेन की 'भुवन शोम' को 1969-70 में पैरलल हिंदी सिनेमा की शुरुआत के तौर पर देखा जाता है। चटर्जी के मुताबिक, "जाहिरतौर पर उस वक्त लोग पैरलल सिनेमा के बारे में नहीं जानते थे। हमने फिल्म उसी तरह बनी, जैसे हम बनाना चाहते थे।"

'सारा आकाश' में कोई स्टूडियो शॉट नहीं था
बकौल चटर्जी, "'सारा आकाश' में एक भी शॉट स्टूडियो का नहीं था। सभी रियल लोकेशन थीं, जिनसे फ्रेशनेस का अहसास हुआ। हम छोटे-मोटे फिल्ममेकर्स की सराहना करते हुए बड़े हुए हैं। हमने हॉलीवुड से प्रेरणा नहीं ली।मणि कौल ने 'सारा आकाश' में काम किया था और इसके लिए उन्होंने 300 रुपए लिए थे।"

लोन लेकर बनाई थी 'सारा आकाश'
एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन अलग तरह की फिल्में बनाने के लिए लोन दे रहा था। चटर्जी को 'सारा आकाश' के लिए भी लोन मिल गया था। हालांकि, फिल्म की रिलीज के बाद जल्दी ही उन्होंने उसका भुगतान भी कर दिया था।"

एक्स्ट्रा पैसा कमाने के उद्देश्य से टीवी पर आए
चटर्जी ने छोटे पर्दे पर पर भी 'रजनी', 'दर्पण' और 'ब्योमकेश बक्शी' जैसे सीरियल दिए। लेकिन हकीकत में वे यहां सिर्फ एक्स्ट्रा पैसा कमाने के इरादे से आए थे। इसे स्वीकारते हुए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "दूरदर्शन उस वक्त नया था और सरकार एयर टाइम की फुल करने के लिए फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ने के लिए उत्सुक थी। उन्होंने कई फिल्ममेकर्स को अप्रोच किया कि कुछ ऐसा बनाया जाए, जिसकी सोशल वैल्यू हो।"

चटर्जी के मुताबिक, उन्होंने यह मौका लपक लिया। लेकिन जब उनका पहला सीरियल 'रजनी' हिट हो गया तो उन्हें अहसास हुआ कि छोटा पर्दा सिर्फ एक्स्ट्रा पैसे कमाने का साधन नहीं है। बल्कि यह फुल टाइम जॉब है। कार्टूनिस्ट होने की वजह से वे देश के सामाजिक मुद्दों से भलीभांति परिचित थे। उन्होंने इन्हीं में से कुछ मुद्दों को 'रजनी' के जरिए दिखाया।



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1969 में आई 'सारा आकाश' बासु चटर्जी की पहली फिल्म थी, जिसे पैरलल सिनेमा की शुरुआत के तौर पर भी देखा जाता है।


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